श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.326.32 
ज्योतिरात्मनि नान्यत्र सर्वजन्तुषु तत् समम्।
स्वयं च शक्यते द्रष्टुं सुसमाहितचेतसा॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
आत्मा का प्रकाश स्वयं के भीतर ही है, अन्यत्र नहीं। वह प्रकाश सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान है। जो अपने मन को भली-भाँति एकाग्र करता है, वह उसे स्वयं देख सकता है। 32॥
 
The light of soul is within oneself, not anywhere else. That light is equally present within all living beings. One who concentrates his mind well can see it himself. 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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