श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.326.29 
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
सम्पश्यन्नोपलिप्येत जले वारिचरो यथा॥ २९॥
 
 
अनुवाद
जो सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मा को और सम्पूर्ण प्राणियों को आत्मा में देखता है, वह संसार की किसी भी वस्तु में आसक्त नहीं होता, जैसे जल में रहने वाला पक्षी जल में रहते हुए भी उससे अछूता रहता है ॥29॥
 
He who sees the Self in all beings and all beings in the Self is not attached to anything in the world just as a bird in the water remains untouched by it even while living in it. ॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)