श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.326.18 
उत्पाद्य पुत्रपौत्रं तु वन्याश्रमपदे वसेत्।
तानेवाग्नीन् यथाशास्त्रमर्चयन्नतिथिप्रिय:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वहाँ पुत्र-पौत्रों को उत्पन्न करके, पुत्रों को गृहस्थी का भार सौंपकर, वन में जाकर वानप्रस्थ आश्रम में निवास करे। उस समय भी उसे शास्त्रों में वर्णित गार्हपत्य आदि अग्नियों की पूजा करनी चाहिए तथा अतिथियों का प्रेमपूर्वक स्वागत करना चाहिए।॥18॥
 
There, after producing sons and grandsons, he should entrust the responsibility of domestic duties to his sons and then go to the forest and live in the Vanaprastha Ashram. Even at that time, he should worship the same Garhapatya and other fires as prescribed in the scriptures and welcome guests with love.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)