श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  12.326.10-11 
शुक उवाच
पित्राहमुक्तो भद्रं ते मोक्षधर्मार्थकोविद:।
विदेहराजो याज्यो मे जनको नाम विश्रुत:॥ १०॥
तत्र गच्छस्व वै तूर्णं यदि ते हृदि संशय:।
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा स ते च्छेत्स्यति संशयम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
शुकदेवजी बोले- राजन! आपका कल्याण हो। मेरे पिता ने मुझसे कहा है कि मेरे आश्रयदाता विदेहराज जनक मोक्षधर्म के पारंगत हैं। यदि तुम्हारे मन में कर्मधर्म या संन्यासधर्म के विषय में कोई शंका हो, तो तुरंत उनके पास जाओ। वे तुम्हारी समस्त शंकाओं का समाधान कर देंगे। 10-11।
 
Shukdevji said- King! May you be blessed. My father has told me that my patron, the famous Videhraj Janak, is an expert in the religion of salvation. If you have any doubt in your heart about the religion of action or retirement, then go to him immediately. He will solve all your doubts. 10-11.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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