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mahabharat 12.324.5: उस अप्सरा को दूसरे रूप में देखकर उसके सम्पूर्ण शरीर में काम व्याप्त हो गया ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.324: शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 324: शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.324.5 
स तामप्सरसं दृष्ट्वा रूपेणान्येन संवृताम्।
शरीरजेनानुगद: सर्वगात्रातिगेन ह॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उस अप्सरा को दूसरे रूप में देखकर उसके सम्पूर्ण शरीर में काम व्याप्त हो गया ॥5॥
 
Seeing that Apsara disguised in another form, lust pervaded his whole body. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)