Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.324.27: नरेश्वर ! वह मोक्षधर्म में ही अपना ध्यान लगाए रहता था; इसलिए गार्हस्थ्य आश्रम पर आश्रित तीनों आश्रमों में उसकी बुद्धि प्रसन्न नहीं होती थी ॥27॥   |   mahabharat अध्याय 12.324: शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 324: शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.324.27 
न त्वस्य रमते बुद्धिराश्रमेषु नराधिप।
त्रिषु गार्हस्थ्यमूलेषु मोक्षधर्मानुदर्शिन:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर ! वह मोक्षधर्म में ही अपना ध्यान लगाए रहता था; इसलिए गार्हस्थ्य आश्रम पर आश्रित तीनों आश्रमों में उसकी बुद्धि प्रसन्न नहीं होती थी ॥27॥
 
Nareshwar! He kept his focus only on Mokshadharma; Therefore, his intellect did not feel happy in the three ashrams dependent on Garhasthya Ashram. 27॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकोत्पत्तौ चतुर्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३२४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवकी उत्पत्तिविषयक तीन सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२४॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)