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mahabharat 12.324.1: भीष्मजी कहते हैं - राजन! एक दिन महादेवजी से उत्तम वर पाकर सत्यवतीनन्दन व्यासजी अग्नि प्रकट करने की इच्छा से दो काष्ठों का मन्थन करने लगे॥1॥   |   mahabharat अध्याय 12.324: शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 324: शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.324.1 
भीष्म उवाच
स लब्ध्वा परमं देवाद् वरं सत्यवतीसुत:।
अरणी सहिते गृह्य ममन्थाग्निचिकीर्षया॥ १॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - राजन! एक दिन महादेवजी से उत्तम वर पाकर सत्यवतीनन्दन व्यासजी अग्नि प्रकट करने की इच्छा से दो काष्ठों का मन्थन करने लगे॥1॥
 
Bhishmaji says – King! One day, after getting a good boon from Mahadevji, Satyavatinandan Vyasji started churning two wooden sticks with the desire to manifest fire. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)