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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 323: व्यासजीकी पुत्रप्राप्तिके लिये तपस्या और भगवान् शंकरसे वरप्राप्ति
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श्लोक 4
श्लोक
12.323.4
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महामते।
न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतोऽमृतमुत्तमम्॥ ४॥
अनुवाद
श्रीमान्! मैं इस प्रवचन को विस्तार से सुनना चाहता हूँ। आपका अमृत-सा मधुर और उत्तम प्रवचन सुनकर मैं तृप्त नहीं हो रहा हूँ।
Sir! I want to hear this discourse in detail. I am not getting satisfied listening to your sermon which is as sweet and excellent as nectar.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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