श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 323: व्यासजीकी पुत्रप्राप्तिके लिये तपस्या और भगवान् शंकरसे वरप्राप्ति  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.323.3 
कथं च बालस्य सत: सूक्ष्मज्ञाने गता मति:।
यथा नान्यस्य लोकेऽस्मिन् द्वितीयस्येह कस्यचित्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव जी तो बालक थे, फिर उनकी बुद्धि सूक्ष्म ज्ञान में कैसे प्रवृत्त हुई? ऐसी बुद्धि इस संसार में उनके अतिरिक्त अन्य किसी में नहीं देखी गई॥3॥
 
Shukdev Ji was still a child, how did his intellect get involved in subtle knowledge? Such intellect was not seen in anyone else except him in this world. ॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)