श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 323: व्यासजीकी पुत्रप्राप्तिके लिये तपस्या और भगवान् शंकरसे वरप्राप्ति  »  श्लोक 17-19
 
 
श्लोक  12.323.17-19 
तत्र ब्रह्मर्षयश्चैव सर्वे राजर्षयस्तथा।
लोकपालाश्च लोकेशं साध्याश्च बहुभि: सह॥ १७॥
आदित्याश्चैव रुद्राश्च दिवाकरनिशाकरौ।
वसवो मरुतश्चैव सागरा: सरितस्तथा॥ १८॥
अश्विनौ देवगन्धर्वास्तथा नारदपर्वतौ।
विश्वावसुश्च गन्धर्व: सिद्धाश्चाप्सरसस्तथा॥ १९॥
 
 
अनुवाद
वहाँ सभी ब्रह्मर्षि, सभी राजर्षि, लोकपाल, अनेक अनुयायियों सहित साध्य, आदित्य, रुद्र, सूर्य, चंद्रमा, वसुगण, मरुद्गण, समुद्र, नदियाँ, दोनों अश्विनीकुमार, देवता, गंधर्व, नारद, पर्वत, गंधर्वराज विश्वावसु, सिद्ध और अप्सराएँ भी लोकेश्वर महादेवजी की पूजा करते थे। 17-19॥
 
There, all the Brahmarshi, all the Rajarshi, Lokpal, along with many followers, Sadhya, Aditya, Rudra, Sun, Moon, Vasugana, Marudgana, sea, rivers, both Ashwinikumars, gods, Gandharva, Narada, mountains, Gandharvaraj Vishwavasu, Siddha and Apsaras also worshiped Lokeshwar Mahadevji. 17-19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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