श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 319: जरा-मृत्युका उल्लंघन करनेके विषयमें पञ्चशिख और राजा जनकका संवाद  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.319.11 
क्षिप्यन्ते तेन तेनैव निष्टनन्त: पुन: पुन:।
कालेन जाता याता हि वायुनेवाभ्रसंचया:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जैसे वायु बार-बार गरजते हुए बादलों को उड़ाकर टुकड़े-टुकड़े कर देती है, वैसे ही काल यहाँ उत्पन्न हुए प्राणियों को उनके रोने-चीखने पर भी प्रलय की अग्नि में झोंक देता है। ॥11॥
 
Just as the wind repeatedly blows away the roaring clouds and breaks them into pieces, similarly, Time throws the creatures born here into the fire of destruction despite their cries and screams. ॥11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)