श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.318.51 
यो घृतार्थी खरीक्षीरं मथेद् गन्धर्वसत्तम।
विष्ठां तत्रानुपश्येत न मण्डं न च वै घृतम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
हे गंधर्व शिरोमणे! जो मनुष्य घी की इच्छा से गधे का दूध मथता है, उसे वहाँ केवल मल ही मिलता है। उसे वहाँ न तो मक्खन मिलता है और न ही घी ॥51॥
 
Gandharva Shiromane! One who churns the milk of a donkey with the desire to obtain ghee, finds only feces there. He neither gets butter nor ghee there. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)