श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 316: योगका वर्णन और उसके साधनसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.316.6 
यावद्धि प्रलयस्तात सूक्ष्मेणाष्टगुणेन ह।
योगेन लोकान् विचरन् सुखं संन्यस्य चानघ॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे निष्पाप राजन! जब तक मृत्यु न हो जाए, तब तक योगी योगबल से इस स्थूल शरीर को यहीं छोड़कर आठ प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त सूक्ष्म शरीर से लोक-परलोक में सुखपूर्वक विचरण करता है।॥6॥
 
Dear sinless king! Until death occurs, the Yogi, by the power of yoga, leaves his physical body here and roams happily in the worlds and other worlds in his subtle body endowed with eight kinds of opulences. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)