श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 315: प्रकृति-पुरुषका विवेक और उसका फल  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  12.315.13-14 
अन्यच्च मशकं विद्यादन्यच्चोदुम्बरं तथा।
न चोदुम्बरसंयोगैर्मशकस्तत्र लिप्यते॥ १३॥
अन्य एव तथा मत्स्यस्तदन्यदुदकं स्मृतम्।
न चोदकस्य स्पर्शेन मत्स्यो लिप्यति सर्वश:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जैसे अंजीर का वृक्ष और उसके कीड़े एक साथ रहने पर भी पृथक् माने जाते हैं, वैसे ही कीड़े अंजीर के वृक्ष के सम्पर्क में आने से उसमें आसक्त नहीं होते और जैसे मछली एक वस्तु है और जल दूसरी वस्तु है, वैसे ही मछली जल के स्पर्श से कभी उसमें आसक्त नहीं होती॥13-14॥
 
Just as the fig tree and its insects are considered to be separate even though they are together, the insects do not get attached to the fig tree by coming in contact with it and just as fish is one thing and water is another thing. A fish never gets attached to water by its touch.॥ 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)