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श्लोक 12.314.18  |
सांख्यज्ञानं च तत्त्वेन पृथग्योगं तथैव च।
अरिष्टानि च तत्त्वानि वक्तुमर्हसि सत्तम।
विदितं सर्वमेतत् ते पाणावामलकं यथा॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| साधुशिरोमणि! सांख्य और योग का ज्ञान भी अलग-अलग तथा मृत्युसूचक लक्षणों का भी यथार्थ रूप से वर्णन कीजिए; क्योंकि ये सब बातें आपको हाथ में रखे हुए आंवले के समान ज्ञात हैं॥18॥ |
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| Sadhushiromane! Also describe the knowledge of Sankhya and Yoga separately and the symptoms indicating death accurately; Because all these things are known to you like a gooseberry held in your hand. 18॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादे चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३१४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य और जनकका संवादविषयक तीन सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१४॥
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