श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 314: सात्त्विक, राजस और तामस प्रकृतिके मनुष्योंकी गतिका वर्णन तथा राजा जनकके प्रश्न  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.314.15 
त्वं हि विप्रेन्द्र कात्‍स्‍न्‍‍‍र्येन मोक्षधर्ममुपाससे।
साकल्यं मोक्षधर्मस्य श्रोतुमिच्छामि तत्त्वत:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मण! आप मोक्षरूपी धर्म का पूर्णतः पालन करते हैं, इसलिए मैं आपके मुख से मोक्षरूपी सम्पूर्ण धर्म को यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ॥15॥
 
O Brahmin! You practice the Dharma of Moksha completely; therefore, I wish to hear the complete Dharma of Moksha in its true form from your mouth. ॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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