श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 312: संहारक्रमका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.312.2 
यथा संहरते जन्तून् ससर्ज च पुन: पुन:।
अनादिनिधनो ब्रह्मा नित्यश्चाक्षर एव च॥ २॥
 
 
अनुवाद
मैं तुम्हें बताता हूँ कि किस प्रकार अनादि और अविनाशी ब्रह्म, आदि-अन्त से रहित होकर बार-बार जीवों की उत्पत्ति और संहार करता है। ध्यानपूर्वक सुनो॥2॥
 
I am telling you how the eternal and immutable Brahma, without beginning or end, repeatedly creates and destroys living beings. Listen attentively. ॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)