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mahabharat 12.311.7: अध्यात्म-सिद्धान्तों का चिंतन करने वाले विद्वान कहते हैं कि ब्रह्माजी की रात्रि भी उतनी ही लम्बी है। महर्षि ब्रह्मा अहंकार नामक दिव्य भूत की रचना करते हैं॥7॥   |   mahabharat अध्याय 12.311: अव्यक्त, महत्तत्त्व, अहंकार, मन और विषयोंकी कालसंख्याका एवं सृष्टिका वर्णन तथा इन्द्रियोंमें मनकी प्रधानताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 311: अव्यक्त, महत्तत्त्व, अहंकार, मन और विषयोंकी कालसंख्याका एवं सृष्टिका वर्णन तथा इन्द्रियोंमें मनकी प्रधानताका प्रतिपादन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.311.7 
रात्रिमेतावतीं चास्य प्राहुरध्यात्मचिन्तका:।
सृजत्यहङ्कारमृषिर्भूतं दिव्यात्मकं तथा॥ ७॥
 
 
अनुवाद
अध्यात्म-सिद्धान्तों का चिंतन करने वाले विद्वान कहते हैं कि ब्रह्माजी की रात्रि भी उतनी ही लम्बी है। महर्षि ब्रह्मा अहंकार नामक दिव्य भूत की रचना करते हैं॥7॥
 
Scholars who contemplate on spiritual principles say that Brahmaji's night is also equally long. The great sage Brahma creates the divine ghost called ego. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)