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श्लोक 12.310.26  |
अत ऊर्ध्वं महाराज गुणस्यैतस्य तत्त्वत:।
महात्मभिरनुप्रोक्तां कालसंख्यां निबोध मे॥ २६॥ |
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| अनुवाद |
| महाराज! अब इसके बाद इस पुण्य सृष्टि का जो काल है, उसे यथावत् रूप में मुझसे सुनो, जैसा महात्माओं ने कहा है। |
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| Maharaj! Now after this, listen to me in its original form, the time period of this virtuous creation, as told by the great souls. 26. |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादे दशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३१०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य-जनक-संवादविषयक तीन सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१०॥
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