श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 31: सुवर्णष्ठीवीके जन्म, मृत्यु और पुनर्जीवनका वृत्तान्त  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.31.7 
आवामस्य नरेन्द्रस्य गृहे परमपूजितौ।
उषितौ समये ब्रह्मंस्तद् विचिन्तय साम्प्रतम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
चाचा! हम लोग राजा संजय के घर में बड़े आदर और सम्मान के साथ ठहरे हैं, अतः हे ब्राह्मण! इस समय उन पर कुछ उपकार करने का विचार कीजिए।'
 
'Uncle! We have stayed with great respect and honour in the house of King Sanjaya, therefore, O Brahman! Please think of doing some favour to him at this time.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)