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mahabharat 12.31.27-28: हे प्रभु! इन्द्र ने मानव रूप धारण करके उनके सामने खड़े होकर अपने दिव्यास्त्र वज्र से कहा - 'वज्र! तुम बाघ बनकर इस राजकुमार का वध करो। जैसा कि पर्वत ने इसके विषय में कहा है, बड़ा होने पर यह संजयपुत्र अपने पराक्रम से मुझे परास्त करेगा।'॥ 27-28॥   |   mahabharat अध्याय 12.31: सुवर्णष्ठीवीके जन्म, मृत्यु और पुनर्जीवनका वृत्तान्त   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 31: सुवर्णष्ठीवीके जन्म, मृत्यु और पुनर्जीवनका वृत्तान्त  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  12.31.27-28 
चोदयामास तद् वज्रं दिव्यास्त्रं मूर्तिमत् स्थितम्।
व्याघ्रो भूत्वा जहीमं त्वं राजपुत्रमिति प्रभो॥ २७॥
प्रवृद्ध: किल वीर्येण मामेषोऽभिभविष्यति।
सृंजयस्य सुतो वज्र यथैनं पर्वतोऽब्रवीत्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! इन्द्र ने मानव रूप धारण करके उनके सामने खड़े होकर अपने दिव्यास्त्र वज्र से कहा - 'वज्र! तुम बाघ बनकर इस राजकुमार का वध करो। जैसा कि पर्वत ने इसके विषय में कहा है, बड़ा होने पर यह संजयपुत्र अपने पराक्रम से मुझे परास्त करेगा।'॥ 27-28॥
 
Lord! Indra stood in front of him in human form and said to his divine weapon Vajra - 'Vajra! You become a tiger and kill this prince. As the mountain has told about him, when he grows up, this son of Sanjaya will defeat me with his valour.'॥ 27-28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)