श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  12.308.9-10h 
केवलं पञ्चविंशं च चतुर्विंशं न पश्यति।
बुध्यमानो यदाऽऽत्मानमन्योऽहमिति मन्यते॥ ९॥
तदा प्रकृतिमानेष भवत्यव्यक्तलोचन:।
 
 
अनुवाद
चौबीसवीं अव्यक्त प्रकृति न तो अद्वितीय ब्रह्म को देख सकती है और न ही पच्चीसवें मूलभूत स्वरूप आत्मा को। जब जीवात्मा अव्यक्त ब्रह्म की ओर देखता है और अपने को प्रकृति से भिन्न मानता है, तब वह प्रकृति का स्वामी हो जाता है। 9 1/2॥
 
The twenty-fourth unmanifested nature can neither see the unique Brahma nor the twenty-fifth elemental form of the soul. When the living soul looks towards the unmanifested Brahma and considers itself different from nature, then it becomes the master of nature. 9 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)