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mahabharat 12.308.5: यदि यह मान लिया जाए कि प्रकृति भी जानती है, तो वह केवल पच्चीसवें तत्त्व - पुरुष को ही उसके साथ एकीभाव करके जान सकती है। प्रकृति के साथ एकीभाव के कारण ही जीवात्मा संग से एक हो जाता है; ऐसा श्रुतिका का कथन है। इसी संगदोष के कारण ही लोग अव्यक्त और अपरिवर्तनशील जीवात्मा को 'मूर्ख' कहते हैं॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.308.5 
बुध्यते यदि वाव्यक्तमेतद् वै पञ्चविंशकम्।
बुध्यमानो भवत्येव सङ्गात्मक इति श्रुति:।
अनेनाप्रतिबुद्धेति वदन्त्यव्यक्तमच्युतम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
यदि यह मान लिया जाए कि प्रकृति भी जानती है, तो वह केवल पच्चीसवें तत्त्व - पुरुष को ही उसके साथ एकीभाव करके जान सकती है। प्रकृति के साथ एकीभाव के कारण ही जीवात्मा संग से एक हो जाता है; ऐसा श्रुतिका का कथन है। इसी संगदोष के कारण ही लोग अव्यक्त और अपरिवर्तनशील जीवात्मा को 'मूर्ख' कहते हैं॥5॥
 
If it is accepted that Prakriti also knows, then it can know only the twenty-fifth element – ​​Purusha, by uniting with it. It is because of union with Prakriti that the soul becomes one with company; this is the statement of Shrutika. It is because of this defect of association that people call the unmanifested and unchangeable soul ‘foolish’.॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)