श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 49-d1h
 
 
श्लोक  12.308.49-d1h 
देवलोकं तथा तिर्यङ्मनुष्यमपि चाश्नुते।
यदि शुध्यति कालेन तस्मादज्ञानसागरात्॥ ४९॥
(उत्तीर्णोऽस्मादगाधात् स परमाप्नोति शोभनम्।)
 
 
अनुवाद
वह देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि योनियों में भटकता रहता है। यदि वह कभी समयानुसार शुद्ध हो जाए, तो इस अज्ञानरूपी गहरे समुद्र को पार करके परम कल्याण को प्राप्त हो जाता है ॥49॥
 
He keeps wandering in the yoni of gods, humans, animals and birds etc. If he ever becomes pure according to the time, then he crosses this deep sea of ​​ignorance and attains the ultimate welfare. ॥ 49॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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