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mahabharat 12.308.34-35: यह ज्ञान केवल उस व्यक्ति को उपदेश करना चाहिए जो भक्त हो, सदाचारी हो, जो निन्दा से सदैव दूर रहता हो, शुद्ध योगी हो, विद्वान हो, सदा शास्त्र का आचरण करने वाला हो, क्षमाशील हो, सबका हितैषी हो, एकान्तवासी हो, शास्त्रों का आदर करता हो, विवाद न करता हो, ज्ञानी हो, ज्ञानी हो, किसी का अहित न करता हो तथा जो इन्द्रियों को वश में करने तथा मन को वश में करने में समर्थ हो।   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  12.308.34-35 
श्रद्धान्वितायाथ गुणान्विताय
परापवादाद् विरताय नित्यम्।
विशुद्धयोगाय बुधाय नित्यं
क्रियावते च क्षमिणे हिताय॥ ३४॥
विविक्तशीलाय विधिप्रियाय
विवादहीनाय बहुश्रुताय।
विजानते चैव न चाहितक्षमे
दमे च शक्ताय शमे च देयम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
यह ज्ञान केवल उस व्यक्ति को उपदेश करना चाहिए जो भक्त हो, सदाचारी हो, जो निन्दा से सदैव दूर रहता हो, शुद्ध योगी हो, विद्वान हो, सदा शास्त्र का आचरण करने वाला हो, क्षमाशील हो, सबका हितैषी हो, एकान्तवासी हो, शास्त्रों का आदर करता हो, विवाद न करता हो, ज्ञानी हो, ज्ञानी हो, किसी का अहित न करता हो तथा जो इन्द्रियों को वश में करने तथा मन को वश में करने में समर्थ हो।
 
This knowledge should only be preached to a person who is devout, virtuous, who always stays away from slander, a pure yogi, learned, who always does scriptures, forgiving, well-wisher of all, a solitary person, who respects the scriptures, who has no disputes, is knowledgeable, knowledgeable, who does no harm to anyone, and who is capable of controlling the senses and controlling the mind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)