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mahabharat 12.308.28: प्रकृति से विमुख व्यक्ति का मिलन होने पर वह मुक्तात्मा बन जाता है। मोक्ष धर्म से युक्त व्यक्ति की संगति करने से जीव मोक्ष प्राप्त करता है।   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.308.28 
वियोगधर्मिणा चैव विमुक्तात्मा भवत्यथ।
विमोक्षिणा विमोक्षश्च समेत्येह तथा भवेत्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
प्रकृति से विमुख व्यक्ति का मिलन होने पर वह मुक्तात्मा बन जाता है। मोक्ष धर्म से युक्त व्यक्ति की संगति करने से जीव मोक्ष प्राप्त करता है।
 
On meeting a person who has lost touch with nature, he becomes a liberated soul. By associating with a person who is endowed with the religion of salvation, a living being attains salvation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)