श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.308.2 
एतदेवं विकुर्वाणो बुध्यमानो न बुध्यते।
गुणान् धारयते ह्येष सृजत्याक्षिपते तदा॥ २॥
 
 
अनुवाद
वास्तव में प्रकृति के संसर्ग से भ्रष्ट हुआ यह जीवात्मा ज्ञान से युक्त होने पर भी परमात्मा को नहीं जान पाता, गुणों को धारण करता है, इसलिए अपने कर्मों पर अभिमान करके सृष्टि और संहार करता है॥ 2॥
 
In reality, even after being endowed with knowledge, the soul which has become corrupted due to the contact of nature is not able to know the Supreme Being. It bears the qualities; hence, taking pride in its actions, it creates and destroys.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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