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mahabharat 12.308.16: मैं पच्चीस तत्वों से भिन्न छब्बीसवाँ परमेश्वर हूँ। इस प्रकार विचार करके जीवात्मा विवेक-बल से ही ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। 16॥   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.308.16 
षड्‍‍‍विंशोऽहमिति प्राज्ञो गृह्यमाणोऽजरामर:।
केवलेन बलेनैव समतां यात्यसंशयम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
मैं पच्चीस तत्वों से भिन्न छब्बीसवाँ परमेश्वर हूँ। इस प्रकार विचार करके जीवात्मा विवेक-बल से ही ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। 16॥
 
'I am the twenty-sixth God apart from the twenty-five elements. There is no doubt in this that by thinking in this way, the living soul attains Brahmabhava only through the power of discrimination. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)