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mahabharat 12.308.13: (अद्वितीय) ब्रह्म के साक्षात्कार से ही मनुष्य सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त होकर अपने परम स्वरूप भगवान को प्राप्त करता है। इसे परमतत्त्व कहते हैं। यह सभी तत्त्वों और मृत्यु से मुक्त है। 13॥   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.308.13 
केवलेन समागम्य विमुक्तोऽऽत्मानमाप्नुयात्।
एतत् तु तत्त्वमित्याहुर्निस्तत्त्वमजरामरम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
(अद्वितीय) ब्रह्म के साक्षात्कार से ही मनुष्य सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त होकर अपने परम स्वरूप भगवान को प्राप्त करता है। इसे परमतत्त्व कहते हैं। यह सभी तत्त्वों और मृत्यु से मुक्त है। 13॥
 
Only by meeting the (unique) Brahma, one freed from all types of bondages attains God in his supreme form. This is called supreme principle. It is free from all elements and from death. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)