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mahabharat 12.306.5: भगवान! मैं विद्या, अविद्या, अक्षर और क्षर तथा सांख्य और योग को पृथक-पृथक पूरी तरह समझना चाहता हूँ। 5॥   |   mahabharat अध्याय 12.306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.306.5 
विद्याविद्ये च भगवन्नक्षरं क्षरमेव च।
साङ्खॺं योगं च कात्‍स्‍न्‍‍‍र्येन पृथक् चैवापृथक् च ह॥ ५॥
 
 
अनुवाद
भगवान! मैं विद्या, अविद्या, अक्षर और क्षर तथा सांख्य और योग को पृथक-पृथक पूरी तरह समझना चाहता हूँ। 5॥
 
Lord! I want to understand completely Vidya, Avidya, Akshar and Kshar and Sankhya and Yoga separately. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)