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mahabharat 12.306.36: भगवान ही प्रजननकर्ता आत्मा प्रकृति को विभिन्न रूपों में रूपान्तरित करते हैं। प्रकृति और उसके विकारों को क्षेत्र कहते हैं। चौबीस तत्वों के अतिरिक्त पच्चीसवाँ तत्व, महात्मा, क्षेत्र में अधिष्ठाता देवता के रूप में निवास करता है। 36॥   |   mahabharat अध्याय 12.306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.306.36 
बहुधाऽऽत्मा प्रकुर्वीत प्रकृतिं प्रसवात्मिकाम्।
तच्च क्षेत्रं महानात्मा पञ्चविंशोऽधितिष्ठति॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
भगवान ही प्रजननकर्ता आत्मा प्रकृति को विभिन्न रूपों में रूपान्तरित करते हैं। प्रकृति और उसके विकारों को क्षेत्र कहते हैं। चौबीस तत्वों के अतिरिक्त पच्चीसवाँ तत्व, महात्मा, क्षेत्र में अधिष्ठाता देवता के रूप में निवास करता है। 36॥
 
It is God who transforms the procreative soul nature into various forms. Nature and its disorders are called fields. Apart from the twenty-four elements, the twenty-fifth element, the great soul, resides in the area as the presiding deity. 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)