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mahabharat 12.306.33-34: श्रेष्ठ! यही प्रकृति के उत्थान और पतन का विषय है। प्रलय के समय इसमें एकता होती है और सृष्टि होने पर यह अत्यन्त भिन्न हो जाती है। राजेन्द्र! इसी प्रकार ज्ञान में निपुण मनुष्यों को प्रकृति की एकता और अनेकता को जानना चाहिए। सृष्टि काल में अव्यक्त प्रकृति ही शासक पुरुष को अनेकता की ओर ले जाती है। यही पुरुष की एकता का द्योतक है। 33-34॥   |   mahabharat अध्याय 12.306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  12.306.33-34 
सर्गप्रलय एतावान् प्रकृतेर्नृपसत्तम।
एकत्वं प्रलये चास्य बहुत्वं च यदासृजत्॥ ३३॥
एवमेव च राजेन्द्र विज्ञेयं ज्ञानकोविदै:।
अधिष्ठातारमव्यक्तमस्याप्येतन्निदर्शनम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
श्रेष्ठ! यही प्रकृति के उत्थान और पतन का विषय है। प्रलय के समय इसमें एकता होती है और सृष्टि होने पर यह अत्यन्त भिन्न हो जाती है। राजेन्द्र! इसी प्रकार ज्ञान में निपुण मनुष्यों को प्रकृति की एकता और अनेकता को जानना चाहिए। सृष्टि काल में अव्यक्त प्रकृति ही शासक पुरुष को अनेकता की ओर ले जाती है। यही पुरुष की एकता का द्योतक है। 33-34॥
 
The best! This is the subject of nature's rise and fall. At the time of destruction it has unity and when creation takes place, it becomes very different. Rajendra! Similarly, people adept in knowledge should know the unity and diversity of nature. It is the unmanifested nature that leads the ruling man towards diversity in the creation period. This is a demonstration of the unity of man. 33-34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)