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mahabharat 12.306.3: अनघ! यद्यपि आपने क्षर और अक्षर का भेद समझाने के लिए अनेक युक्तियां बताई हैं, तथापि मेरी चंचल बुद्धि के कारण मैं उन सब युक्तियों को भूल गया हूँ॥3॥   |   mahabharat अध्याय 12.306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.306.3 
अक्षरक्षरयोरुक्तं त्वया यदपि कारणम्।
तदप्यस्थिरबुद्धित्वात् प्रणष्टमिव मेऽनघ॥ ३॥
 
 
अनुवाद
अनघ! यद्यपि आपने क्षर और अक्षर का भेद समझाने के लिए अनेक युक्तियां बताई हैं, तथापि मेरी चंचल बुद्धि के कारण मैं उन सब युक्तियों को भूल गया हूँ॥3॥
 
Anagha! Although you have told many tricks to explain the difference between kshar and akshar, yet due to my unstable intellect, I have forgotten all those tricks. ॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)