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mahabharat 12.306.18: उस अवस्था में वह वायुरहित स्थान में स्थिर रखे हुए जलते हुए दीपक के समान चमकता है। लिंग का शरीर से कोई संबंध नहीं रहता। वह इतना स्थिर हो जाता है कि ऊपर, नीचे या मध्य में कहीं भी उसकी कोई गति नहीं होती। 18॥   |   mahabharat अध्याय 12.306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.306.18 
निर्वाते हि यथा दीप्यन् दीपस्तद्वत् प्रकाशते।
निर्लिङ्गोऽविचलश्चोर्ध्वं न तिर्यग् गतिमाप्नुयात्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उस अवस्था में वह वायुरहित स्थान में स्थिर रखे हुए जलते हुए दीपक के समान चमकता है। लिंग का शरीर से कोई संबंध नहीं रहता। वह इतना स्थिर हो जाता है कि ऊपर, नीचे या मध्य में कहीं भी उसकी कोई गति नहीं होती। 18॥
 
In that state it shines like a burning lamp kept motionless in an airless place. The penis has no connection with the body. It becomes so still that it has no movement anywhere up, down or in the middle. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)