श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 305: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर  »  श्लोक 8-9h
 
 
श्लोक  12.305.8-9h 
अन्योन्यगुणसंरोधादन्योन्यगुणसंश्रयात्।
एवमेवाभिसम्बद्धौ नित्यं प्रकृतिपूरुषौ॥ ८॥
पश्यामि भगवंस्तस्मान्मोक्षधर्मो न विद्यते।
 
 
अनुवाद
प्रभु! इस प्रकार प्रकृति और पुरुष दोनों एक-दूसरे के गुणों को आवृत करके तथा एक-दूसरे के गुणों का आश्रय लेकर सृष्टि का निर्माण करते हैं। इस प्रकार मैं इन दोनों को सदैव एक-दूसरे से सम्बन्धित देखता हूँ। अतः मनुष्य के लिए मोक्ष प्राप्त करना असम्भव प्रतीत होता है। 8 1/2॥
 
Lord! In this way, both nature and man create creation by covering each other's qualities and taking shelter of each other's qualities. In this way I always see these two related to each other. Therefore, it seems impossible for a man to attain salvation. 8 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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