| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 305: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर » श्लोक 34 |
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| | | | श्लोक 12.305.34  | यदा प्रबुद्धा ह्यव्यक्तमवस्थाजन्मभीरव:।
बुध्यमानं प्रबुध्यन्ति गमयन्ति समं तदा॥ ३४॥ | | | | | | अनुवाद | | जिस समय बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था अथवा जन्म-मृत्यु से भयभीत रहने वाले बुद्धिमान पुरुष अव्यक्त परमेश्वर के चेतन स्वरूप का तत्त्व भलीभाँति समझ लेते हैं, उस समय वे परमेश्वर के स्वरूप को प्राप्त हो जाते हैं॥34॥ | | | | The time when wise men, who are afraid of childhood, youth and old age or birth and death, properly understand the essence of the conscious form of the unmanifested God, at that time they attain the form of the Supreme God. 34॥ | | ✨ ai-generated | | |
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