श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 305: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.305.28 
अनादिनिधनोऽनन्त: सर्वदर्शी निरामय:।
केवलं त्वभिमानित्वाद् गुणेषु गुण उच्यते॥ २८॥
 
 
अनुवाद
आत्मा जन्म-मरण से रहित, अनंत, सबका द्रष्टा और अपरिवर्तनशील है। सत्व आदि गुणों का अभिमान होने के कारण ही उसे गुणस्वरूप कहा गया है।
 
The soul is free from birth and death, infinite, the observer of everything and without any change. He is called Gunaswarupa only because of having pride in Satva etc. qualities.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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