श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 305: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.305.25 
पुमांश्चैवापुमांश्चैव त्रैलिङ्गॺं प्राकृतं स्मृतम्।
न वापुमान् पुमांश्चैव स लिङ्गीत्यभिधीयते॥ २५॥
 
 
अनुवाद
पुरुष और प्रकृति ये दो तत्त्व हैं। इनके स्वरूप को प्रकट करने वाले सात्त्विक, राजस और तामस ये तीन प्रकार के प्रतीक प्रकृति माने गए हैं; परंतु जो लिंग है, अर्थात् जो आत्मा इन सबका आधार है, उसे न तो पुरुष कहा जा सकता है और न प्रकृति। वह उन दोनों से भिन्न है॥ 25॥
 
Purusha and Prakriti are the two elements. The three types of Sattvik, Rajas and Tamas symbols which express their nature are considered to be Prakrit; but the one who has gender i.e. the soul which is the basis of all these, can neither be called Purusha nor Prakriti. It is different from both of them.॥ 25॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd