| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 305: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर » श्लोक 24 |
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| | | | श्लोक 12.305.24  | त्वङ्मांसं रुधिर मेद: पित्तं मज्जास्थि स्नायु च।
अष्टौ तान्यथ शुक्रेण जानीहि प्राकृतानि वै॥ २४॥ | | | | | | अनुवाद | | राजन! तुम्हें यह जानना चाहिए कि त्वचा, मांस, रक्त, मैदा, पित्त, मज्जा, अस्थि और स्नायु- ये आठों पदार्थ वीर्य से उत्पन्न हुए हैं; इसीलिए वह प्राकृत ही है॥24॥ | | | | Rajan! You should know that skin, flesh, blood, flour, bile, marrow, bones and nerves – all these eight things have arisen from semen; That is why it is Prakrit only. 24॥ | | ✨ ai-generated | | |
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