श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 305: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.305.17 
निर्णयं चापि छिद्रात्मा न तं वक्ष्यति तत्त्वत:।
सोपहासात्मतामेति यस्माच्चैवात्मवानपि॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जिसका मन शास्त्र-ज्ञान से रहित है, वह शास्त्रों का अर्थ ठीक से नहीं समझ सकता। यदि वह कुछ कहता भी है, तो बुद्धिमान होते हुए भी लोगों के उपहास का पात्र बनता है। ॥17॥
 
One whose mind is devoid of knowledge of scriptures cannot judge the meaning of the scriptures correctly. If he says something, then despite being intelligent, he becomes the object of ridicule of people. ॥ 17॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd