श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 304: प्रकृतिके संसर्गदोषसे जीवका पतन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.304.8 
तदेव षोडशकलं देहमव्यक्तसंज्ञकम्।
ममायमिति मन्वानस्तत्रैव परिवर्तते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
अज्ञानी जीव इस सोलह कलाओं (मूल प्रकृति, दस इन्द्रियाँ, एक प्राण और चार प्रकार के अन्तःकरण) से युक्त सूक्ष्म शरीर को 'मेरा' मानकर उसमें विचरण करता है ॥8॥
 
The ignorant soul wanders in this subtle body which is composed of sixteen phases (original nature, ten senses, one life force and four kinds of conscience) believing it to be 'mine'. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)