श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 304: प्रकृतिके संसर्गदोषसे जीवका पतन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.304.5 
कलायां जायतेऽजस्रं पुन: पुनरबुद्धिमान्।
धाम तस्योपयुञ्जन्ति भूय एवोपजायते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
अज्ञानी जीवात्मा उन्हीं गतियों में बार-बार जन्म लेता है। वे गतियाँ ही ऐसी हैं जिनका आश्रय आत्मा ले सकता है, इसलिए आत्मा उन्हीं से बार-बार जन्म लेता है ॥5॥
 
The ignorant soul is born again and again in the same phases. Those phases are the only ones that a soul can take shelter in, and hence the soul is born again and again from them. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)