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mahabharat 12.303.6: इसी प्रकार वह जलोदर, प्यास, ज्वर, गण्डमाला, हैजा, श्वेत कुष्ठ, अग्निदाह, सिध्द (सफेद दाग या ल्यूकोडर्मा), मृगी आदि रोगों का शिकार रहता है॥6॥   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.303.6 
जलोदरे तृषारोगे ज्वरगण्डे विषूचके।
श्वित्रकुष्ठेऽग्निदग्धे च सिध्मापस्मारयोरपि॥ ६॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार वह जलोदर, प्यास, ज्वर, गण्डमाला, हैजा, श्वेत कुष्ठ, अग्निदाह, सिध्द (सफेद दाग या ल्यूकोडर्मा), मृगी आदि रोगों का शिकार रहता है॥6॥
 
Similarly, he remains a victim of diseases like dropsy, thirst, fever, goiter, cholera, white leprosy, fire burn, siddha* (white spot or leucoderma), epilepsy etc.॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)