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mahabharat 12.303.51: वह लिंग (सूक्ष्म) शरीर से हीन होते हुए भी अपने को उससे पूर्ण मानता है। कालधर्म (मृत्यु) से रहित होते हुए भी अपने को कालधर्म (मर्त्य) मानता है। सत्त्व से भिन्न होते हुए भी अपने को सत्त्व मानता है और महाभूत आदि तत्त्वों से रहित होते हुए भी अपने को तत्त्व मानता है। 51॥   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.303.51 
अलिङ्गो लिङ्गमात्मानमकाल: कालमात्मन:।
असत्त्वं सत्त्वमात्मानमतत्त्वं तत्त्वमात्मन:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
वह लिंग (सूक्ष्म) शरीर से हीन होते हुए भी अपने को उससे पूर्ण मानता है। कालधर्म (मृत्यु) से रहित होते हुए भी अपने को कालधर्म (मर्त्य) मानता है। सत्त्व से भिन्न होते हुए भी अपने को सत्त्व मानता है और महाभूत आदि तत्त्वों से रहित होते हुए भी अपने को तत्त्व मानता है। 51॥
 
Despite being inferior to the linga (subtle) body, he still considers himself complete with it. Despite being free from Kaaldharma (death), he considers himself Kaaldharma (mortal). Despite being different from Sattva, it considers itself to be Sattva and despite being devoid of elements like Mahabhuta, it considers itself to be Tattva. 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)