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mahabharat 12.303.46: देवलोक में तिर्यग्योनियाँ, मनुष्ययोनियाँ और देवयोनियाँ - ये कर्म-फल-भोग के तीन स्थान हैं। इन सबको स्वाभाविक समझो। 46॥   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  12.303.46 
तिर्यग्योनिमनुष्यत्वं देवलोके तथैव च।
त्रीणि स्थानानि चैतानि जानीयात् प्रकृतानिह॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
देवलोक में तिर्यग्योनियाँ, मनुष्ययोनियाँ और देवयोनियाँ - ये कर्म-फल-भोग के तीन स्थान हैं। इन सबको स्वाभाविक समझो। 46॥
 
Tiryagyoni, Manushyayoni and Devyoni in Devlok are the three places of karma-results-bhog. Consider all these as natural. 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)