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mahabharat 12.303.45: वास्तव में प्रकृति ही शुभाशुभ फल देने वाले कर्मों को करती है और प्रकृति ही अपनी इच्छानुसार तीनों लोकों में विचरण करती है और उन कर्मों का फल भोगती है (परन्तु अज्ञान के कारण मनुष्य कर्ता और भोक्ता दोनों बन जाता है)। 45॥   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  12.303.45 
प्रकृति: कुरुते कर्म शुभाशुभफलात्मकम्।
प्रकृतिश्च तदश्नाति त्रिषु लोकेषु कामगा॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
वास्तव में प्रकृति ही शुभाशुभ फल देने वाले कर्मों को करती है और प्रकृति ही अपनी इच्छानुसार तीनों लोकों में विचरण करती है और उन कर्मों का फल भोगती है (परन्तु अज्ञान के कारण मनुष्य कर्ता और भोक्ता दोनों बन जाता है)। 45॥
 
In reality, it is nature itself that performs the rituals that give auspicious and auspicious results and it is nature itself that moves around in the three worlds as per its wish and enjoys the fruits of those actions (but due to ignorance, man becomes the doer and the enjoyer). 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)