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mahabharat 12.303.42-43h: इसी प्रकार वह जीव मनुष्य योनि से नरक में (और नरक से मनुष्य योनि में) क्रमशः आता-जाता रहता है। आत्मा से भिन्न तथा आत्मा, चेतना आदि गुणों से युक्त इन्द्रियों का समुदाय, जिसके शरीर में ऐसा भाव रहता है कि 'यह मैं हूँ', वही देवलोक, मनुष्यलोक, नरक और स्वर्गलोक में जाता है। 42 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 42-43h
 
 
श्लोक  12.303.42-43h 
मनुष्यत्वाच्च निरयं पर्यायेणोपगच्छति।
य एवं वेत्ति नित्यं वै निरात्माऽऽत्मगुणैर्वृत:॥ ४२॥
तेन देवमनुष्येषु निरये चोपपद्यते।
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार वह जीव मनुष्य योनि से नरक में (और नरक से मनुष्य योनि में) क्रमशः आता-जाता रहता है। आत्मा से भिन्न तथा आत्मा, चेतना आदि गुणों से युक्त इन्द्रियों का समुदाय, जिसके शरीर में ऐसा भाव रहता है कि 'यह मैं हूँ', वही देवलोक, मनुष्यलोक, नरक और स्वर्गलोक में जाता है। 42 1/2॥
 
Similarly, that creature keeps coming and going from human life to hell (and from hell to human life) one by one. The community of senses different from the soul and having the qualities of the soul, consciousness etc., which has such a feeling in the body that 'This is me', only he goes to the world of gods, the world of humans, hell and heaven. 42 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)