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mahabharat 12.303.35: हे प्रभु! प्रकृति ने इस सम्पूर्ण जगत को अन्धा बना दिया है। इसी के संयोग से सभी पदार्थ अनेक प्रकार से रजोगुण और तमोगुण से व्याप्त हो रहे हैं। 35॥   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.303.35 
प्रकृत्या सर्वमेवेदं जगदन्धीकृतं विभो।
रजसा तमसा चैव व्याप्तं सर्वमनेकधा॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! प्रकृति ने इस सम्पूर्ण जगत को अन्धा बना दिया है। इसी के संयोग से सभी पदार्थ अनेक प्रकार से रजोगुण और तमोगुण से व्याप्त हो रहे हैं। 35॥
 
Lord! Nature has made this entire world blind. Due to its combination, all substances are being permeated with Rajoguna and Tamoguna in many ways. 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)