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mahabharat 12.303.31-32h: जगत् की उत्पत्ति और संहार करने वाली प्रकृति ही है। जैसे सूर्य प्रतिदिन प्रातःकाल अपनी किरणों को सर्वत्र फैलाता है और सायंकाल अपनी किरणों को वापस ले लेता है, वैसे ही आदि पुरुष ब्रह्मा अपने दिन-कल्प के प्रारम्भ में तीनों गुणों का विस्तार करते हैं और अन्त में उन्हें वापस ले लेते हैं और अकेले रह जाते हैं॥31 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 31-32h
 
 
श्लोक  12.303.31-32h 
प्रकृति: कुरुते देवी भवं प्रलयमेव च।
दिवसान्ते गुणानेतानभ्येत्यैकोऽवतिष्ठते॥ ३१॥
रश्मिजालमिवादित्यस्तत् तत्काले नियच्छति।
 
 
अनुवाद
जगत् की उत्पत्ति और संहार करने वाली प्रकृति ही है। जैसे सूर्य प्रतिदिन प्रातःकाल अपनी किरणों को सर्वत्र फैलाता है और सायंकाल अपनी किरणों को वापस ले लेता है, वैसे ही आदि पुरुष ब्रह्मा अपने दिन-कल्प के प्रारम्भ में तीनों गुणों का विस्तार करते हैं और अन्त में उन्हें वापस ले लेते हैं और अकेले रह जाते हैं॥31 1/2॥
 
It is the Mother Nature who creates and destroys the world. Just as the Sun spreads its rays everywhere every morning and withdraws its rays in the evening, similarly the primal man Brahma expands the three Gunas at the beginning of his day-kalpa and in the end withdraws them all and remains alone.॥ 31 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)