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mahabharat 12.303.29: कभी वह यज्ञ करता है और करवाता है, कभी वेद पढ़ता और पढ़ाता है, कभी दान देता और दान लेता है। इसी प्रकार वह अन्य कार्य भी करता है।   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.303.29 
याजनाध्यापनं दानं तथैवाहु: प्रतिग्रहम्।
यजनाध्ययने चैव यच्चान्यदपि किंचन॥ २९॥
 
 
अनुवाद
कभी वह यज्ञ करता है और करवाता है, कभी वेद पढ़ता और पढ़ाता है, कभी दान देता और दान लेता है। इसी प्रकार वह अन्य कार्य भी करता है।
 
Sometimes he performs yagnas and gets them performed, sometimes he reads and teaches the Vedas and sometimes he gives donations and receives gifts. In the same way he also performs other tasks.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)